मंगलवार, 28 जुलाई 2009


विजय शिखर !!
बहुत सी आस ले ये मन चला पाने शिखर,

मगर दिल मे है जाने कौन सा अंजाना डर !

कही आंधी न आजाये न खा जाऊँ मै ठोकर ,

समय है कम सफर लंबा बचे है कुछ पहर!

बहुत से हाथ मेरे हाथ को थामे हुए है ,

बहुत से लोग मुझ को अपना सा माने हुए है !

कई रिश्तों की जंजीरे मेरे पैरो मे है ,

कई अनजाने मुझ को दोस्त सा जाने हुए है !

मगर फिर भी है सूनापन मन मे कही,

साँथ काफिला पर लगे तनहा सफर !!

कई छोटे बड़े ख्वाब आँखो मे बसते,

कई अरमान मेरे मन मे रोज सजते !

कई उम्मीद के घरोंदे बन गए है ,

न पाई खुशी के सुर कानो मे बजते !

मगर अंजाना सा डर मन मे है ,

न जाने कौन होगा इस सफर मे हमसफ़र !!

है हर बात का अहसास पर जारी सफर,

न चिंता आए कोई भी मुश्किल अगर !

न जाने कौन सी ताकत है ये मन लिए ,

न लगता कोई भी बाधा से इसको डर !

है बस आस की पूरी हो मांगी दुआ जो ,

मिले जो चाहे कुछ पाना विजय शिखर !!

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