मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

आदर्श प्रेमिका के गुण

भई बात कई साल पहले की है, एक धार्मिक फ़िल्म के हिट हो जाने के बाद, हमारे गांव में लोग पर्चों पर, संतोषी माता के चमत्कारों के किस्से छाप कर उन्हें बंटवाने लगे. पर्चे पे नीचे छोटी फ़ांट मे लिखा होता था की आप भी ऐसे २५०/५००/१००० पर्चे छपवा के बांटो वरना अनिष्ट होगा और ये भी की जिन्होंने पर्चे बांटे उन्हें गडा धन मिला आदी नए चमत्कार हुए – अब पढने वाला “टैग” हो जाता था – होना क्या था गंवार लोगों को इस प्रकार के पर्चे छपवा के बंटवाने का दौरा आ गया. चमत्कारों का तो पता नही गांव की प्रिंटिंग प्रेस वाले की जरूर निकली पडी – संतोषी मां के चमत्कारों वाले पर्चे स्पेशल रेट पे छपवाने का बोर्ड अलग बनवा लिया उस ने. हम आज तक उस प्रिंटिंग प्रेस वाले को इस “चमत्कारी पर्चे” की कांस्पीरेसी करने के लिए दाद देते हैं, वो पट्ठा साफ़ मुकर जाता है.

फ़िर चेन-मेल का दौर भी देखा. आज एक ही विषय पर अपनी अपनी हांकने के लिए हमारे पास अक्षरग्राम पर अनुगूंज के आयोजन का प्रबंध भी है. अब ये बाकायदा टेग्गिंग नामक छूत की बिमारी ने आन जकडा है. अमित ने हमें टैग किया है, यानी एक विषय पर लिखना है जिस पर अन्य लोग लिखे आ रहे हैं और बिमारी फ़ैल रही है. हमें इस बिमारी को आगे फ़ैलाना है आदर्श प्रेमिका के गुण गिना कर.

तो देसी चाहे गांव मे रहें या शहर में, देस मे या विदेस मे, मालवी/निमाडी में बोलें या अंगरेज्जी झाडें, हरकतें एक जैसी ही करते हैं. संतोषी माता के चमत्कार का स्थान प्रेमी/प्रेमिका के गुणों ने ले लिया है और प्रिंटिंग प्रेस की जगह ब्लाग.

तो वो भी क्या दिन था यार. एक कन्या ने हम से पूछा था कभी – तुम्हें एक लडकी में क्या गुण चाहिए? सवाल सुन के हम सकपका गए थे. काहे से की लडकी चाहिये वो पता था कैसी चाहिये सोचने की नौबत नही आयी थी – उस जमाने मे भारतीय किशोर “लगे मुझे सुन्दर हर लडकी” वाली फ़्रस्टू हालत मे जीता था – हम भी उसी बदहाली में दिन गुजार रहे थे. अब कोई भरे समन्दर में प्यास से मर रहा है, पानी की तलाश में अपनी नैया अपने हाथ खे रहा है. आप पूछो – “आप कोकाकोला,रूह-अफ़जा,नीबू-पानी, छाछ क्या लोगे?” तो प्यासा क्या बोलेगा – “अबे जो हाथ लगे ले आ!”.

लेकिन कन्या के सामने अपना कूलत्व सिद्ध करना मजबूरी थी – सो हमने सकपकाहट को बडे स्टाईल से छुपा के पहली पटकी –
“उंह .. भूखे शेर घांस नही खाने लग पडते! तुम हमारी सपनों की रानी के गुणों की लिस्ट जान कर क्या कर लोगी?”
हमारा आत्ममोहित कूलत्व का डोज़ कन्या को ओवर-डोज़ हो गया, हमे लगा था वो इसे एक चेलेन्ज मानेगी और क्यूरियस हो कर “बताओ ना.. बताओ ना” कर के सपनो की रानी के गुण पूछेगी, फ़िर अपने मे वो सारी योग्यताये होने का दवा करेगी. वो मेनका के समान हमरी तपस्या भंग करने के लिए जुट जाएगी. लेकिन कन्या हमारे जवाब से बिदक चुकी थी और पांव पटकती हुई चल दी और हमें एहसास हुआ की हमने श्याणे बनने के चक्कर में अपने पांव पर कुल्हाडा मार लिया है.

आशावादी उस्तादों ने यही सिखाया था “लडकी और ट्रेन के छूट जाने का अफ़सोस नही किया करते – एक जाएगी तो अलगी आएगी”. हमें लगा हमरे अच्छे दिन दस्तक दे रहे हैं. उस रात हम एक विश्वस्त मित्र के साथ हमारी होने वाली सपनों की रानी के गुणों की लिस्ट बनाने के लिए जुट गए – हिंदी अंग्रेजी संस्कृत शब्दकोश खोल गये. कुमारसंभव, गीत गोविंदम से ले कर कामसूत्र तक की पूरी रेंज कवर की गई. प्रेम के मामले में अपना अजेंडा था फ़र्स्ट कम फ़र्स्ट सर्व्ड – गुणों के मामले मे रुख लचीला था. जैसा की स्पष्ट ही है. लेकिन जस्ट इन केस अगर कोई पूछ ले तो लिस्ट तो तैयार होना मांगता ना!

तो काफ़ी सोच विचार के बाद संस्कृत शब्द चाहे जितने सटीक थे उन्हें क्लिष्ट और ओल्डस्कूल माना जा सकता है ये सोच कर राम भरोसे हाई-स्कूल के लेवल पे जितनी आती थी उतनी अंग्रेजी मे से एक बडी बेवकूफ़ाना लिस्ट बनाई गई – कुल जमा तीन गुण “सेन्सिटिव, सेन्सीबल, सेन्सेशनल” (सौंदर्य के परिपेक्ष्य में), और कन्या के मूड को और उत्साह को देखते हुए गुण गिना कर आगे “..जैसे की तुम हो” जोड कैसे कहा जाए इस पर राय भी बनी – ताकी एक ही बार में मामला टोटली सील किया जा सके!

तैयारी होने के बावजूद जीवन मे कभी गुणों की इस लिस्ट के प्रयोग का मौका नही मिला. लेकिन कहते हैं कोई भी तैयारी वेस्ट नही जाती.

कुछ समय बाद मित्र को इन्ही हालात में लिस्ट की दरकार आन पडी, उसने हमारी साझा तैयारी का सदुपयोग किया और जोश में और शायद कालीदास के श्रंगार रस के प्रभाव में, गुणों की लिस्ट में लगे हाथ “सेंसुअस” भी जोड कर प्रस्तुत कर दिया. साथ ये भी की “.. जैसी की तुम हो” – देसी कन्या ने मित्र का मंतव्य और फ़िर गंतव्य भांपा और वो भी इस जल्दबाजी पर खरी-खोटी सुना कर पैर पटकती हुई चल दी. मित्र समझदार था – वो बोला इस मे उस का कोई दोष नही है – वो तो भोला और अनाडी है ऐसी स्थिती में काम आने वाली लिस्ट तो हमने बना के उसे रटाई थी! तो हम पूरी तरह काम आ गए और मित्र का काम बन गया. इस प्रकरण की खबर पाने वाली अन्य कन्याओं के बीच हमारी साख का काम तमाम हो चुका था.

तो प्रेमिका कैसी हो इस पर किसी जमाने में मित्र के ४ गुण गिनाने पर जो बवाल हुआ था वो आज तक याद है और अब आठ गुण गिनाने का नियम देख कर सोच मे पड गया हूं.

अगर आदर्श प्रेमिका की बात करें तो आज हमारे गुणों के प्रिफ़रेंस बदल चुके हैं – आज प्रेमिका कम और चतुर मंत्राणी की जरूरत अधिक है. ताकी हम आराम से सर्फ़िंग कर सकें और जीवन की नैया एक कुशल महिला के हाथ में दे कर ब्लाग लिख सकें. गुण सूची निम्नलिखित है –

१. प्रसन्नचित्त
२. नीति-कुशल
३. स्वावलंबी
४. सहिष्णु
५. स्पष्टवक्ता
६. विश्वसनीय
७. सुंदर
८. पाककला (कुकिंग) मे कुशल हो क्योंकी हम खाने मे हूं.

आशा है की ये दोनो लिस्टें चार गुण वाली और आठ गुण वाली भी, कुआंरो के काम आएंगी! :)

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